बृहस्पति ग्रह संबंधित विचार एवं अनुभव
बृहस्पति ग्रह संबंधित विचार एवं अनुभव
देवगुरु बृहस्पति को नौ ग्रहो में सबसे श्रेष्ठ मन गया है यह अन्य सभी ग्रहो से आकार में बड़ा है इसका व्यास 1578752 कि-मी- बताया गया है संभवतया इसके विस्तृत आकार के कारण ही इसका नाम गुरु रखा गया सूर्य से इसकी दूरी का अनुमान 773120000 कि-मी- बतायी गयी है यह पृथ्वी से लगभग 587200]000 कि-मी- की दूरी तक आ जाता है इसकी गति 12 कि-मी- प्रति सैकिण्ड है इस गति से लगभग 4332 दिन अथवा 12 वर्षो में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है इसके 12 उपग्रह बताये जाते है कुछ विद्वान इसके 4 उपग्रह बताते है जो इसके चारो ओर चक्कर लगते है
बृहस्पति के अनेक पर्याय नाम है %& गुरु] आर्य & गीष्मपति & धिषण & आंगिरस] चित्र & शिखंडिज] वचसांपती] वाक्पति] जीव इज्यदेवेज्य] सुराधिप] देवमन्त्री] विवुधपतिगुरु] बृहस्पति] कुलिसकरनुत & गीवर्नाणवंद्य & प्रशांत] त्रिविवेशवंद्य] सुरि] सुरेज्य] ग्रहराजयौ] प्रचक्षस] मंत्री वाचस्पति] सुराचार्य] अंगिरा] ईडय] वासवगुरु & प्राग्भव &प्राकफाल्गुन] अमरगुरु आदी बृहस्पति का पौराणिक परिचय & ऋषि की तीसरी पुत्री श्रद्धा का विवाह अंगिरा ऋषि के साथ हुआ था उन्ही के गर्भ से बृहस्पति का जन्म हुआ है ये देवताओ के गुरु पद पर अभिषिक्त है] अतः इन्हे गुरु भी कहा जाता है पुराणों के अनुसार बृहस्पति की स्थिति मंगल से ऊपर दो लाख योजन की दुरी पर है। यदि यह ग्रह वक्र गति से न चले तो एक राशि को एक वर्ष में पार कर लेता है। इसे सौम्य तथा सात्विक शुभ ग्रह माना गया है। यह कफ] धातु एवं चर्बी की वृद्धि करने वाला है तथा हृद्य की शक्ति का कारक है इसके द्वारा विद्या] शोध] धन] पुत्र] पात्र] पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुख] घर] राज्य&सम्मान] लाभ कीर्ति] पवित्र व्यवहार तथा इन्द्रिय निग्रह आदि का विचार किया जाता है। धनु तथा मीन राशियों पर इसका आधिपत्य माना गया है। धनु राशि पर यह अधिक बलि होता है। इसका उच्च स्थान कर्क एवं नीच स्थान मकर राशि है। मेष] सिंह] कन्या तथा वृश्चिक इसकी मित्र रशिया है। यह सूर्य के साथ सात्विक] चन्द्रमा के साथ राजस] मंगल के साथ तामस एवं बुध तथा शुक्र के साथ शत्रुतापूर्ण व्यव्हार रखता है। यह अपने स्थान से पंचम] सप्तम तथा नवम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। लग्न में स्थित बृहस्पति बलि होता है तथा केन्द्रस्थ बृहस्पति एक लाख दोषो को दूर करने वाला माना जाता है। मतान्तर से दितीय स्थान में बैठा हुआ बृहस्पति विशेष बलि होता है। यदि यह लग्न में अथवा चन्द्रमा के साथ कही बैठा हो तो चेष्टा बली होता है।
यह पूर्वाफाल्गुनी] उत्तराषाढा] पुनर्वसु] पूर्वाभाद्रपद तथा विशाखा नक्षत्रो में शुभ फलदायक तथा आद्रा] स्वाती] शतभिषा आदि नक्षत्रो में अशुभ फलदायक होता है। यह अपनी दशा में कफ तथा चर्बी आदि पर विशेष प्रभाव डालता है। सूर्य तथा शुक्र के बाद यह सौरमंडल का अत्यधिक दीप्तिमान ग्रह है। यह सत्वगुण प्रधान आकाश तत्व वाला ग्रह है।
'' शनिक्षेत्रगतो जीवो जीवक्षेत्रगतः शनिः।
स्थानहानि करो जीवः स्थानः वृद्धि करः शनिः।। ''
इसके बाद भी प्रत्यक्ष अनुभव में वास्तव में स्थान हानि वाला सूत्र ही गुरु ग्रह के फलित अधिक सार्थक प्रतीत होते है। इतना ही नहीं ब्रशपति भिन्न भिन्न वर्ण के जातको को उनकी कुंडली में एक ही भाव में स्थित होने पर भी भिन्न भिन्न फल प्रदान करता है| अलग अलग राशियों का बृहस्पति भी एक ही स्थान में भिन्न भिन्न फल देता है|
बृहस्पति के फलित का रहस्य जानने के लिए गहन अध्ययन कर ऐसा ही देखा गया है कि जिस भाव में गुरु अकेला बैठा है उस स्थान या भाव संबंधी फल कि हानि ही होती है| और जिस भाव या स्थान पर जहा कोई ग्रह न बैठा हो, गुरु कि 5,7,9 वी द्रष्टि हो उस भाव को भी निश्चित हानि करता है और जिन जिन ग्रहो पर पूर्ण द्रष्टि हो उनको बलवान बनाकर शुभफल प्रदान करने को प्रेरित करता है | जिस ग्रह के स्थान ब्रशपति बैठा हो यदि वह शनि, राहु या केतु हो तो अशुभ फल देता है किन्तु बृहस्पति पाप ग्राहो के साथ रहकर अपनी दशा में अशुभ फल देता है और आप ग्रहों कि दशा हो तो बहुत शुभ फल देता है| बृहस्पति यदि वक्र है तो आधाफल देता है तथा अस्त रहने पर सामान्य शुभ है | अनुभव में आया है कि अधिकतर बृहस्पति ग्रह अपने अनुकूल आचरण वालो को भी शुभफल देता है अन्य को नही | ऐसा पुर्वोचार्यो का अध्ययन है प. श्री नागेन्द्रदत्त व्यास के एक सटीक लेख के अनुसार बृहस्पति जहा बैठा हो उस भाव (स्थान) संबंधी कारको कि अवश्य ही हानि करता है इसमें कोई संदेह नहीं है |
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भगवान राम कि जन्मकुंडली में लग्न का गुरु वनवास दे गया,
भीष्मपितामह का दूसरा गुरु राज्याधिकार एवं स्वकोतुम्बिक सुख से वंचित कर गया |
तृतीय स्थान के गुरु ने बलि को पाताल भेजा |
चतुर्थ गुरु ने राजा हरिश्चंद्र को महान दुःख दिया |
पांचवे गुरु ने महाराजा दशरथ को पुत्र शोक दिया |
छठे गुरु ने द्रोपदी का चीर हरण करवाया |
सातवे गुरु ने राजा अज को पत्नी वियोग दिया |
आठवे गुरु ने रावन को मरण,
नवे गुरु के कारण विश्वामित्र ने अभक्ष्य भक्षण किया |
दशवे गुरु ने दुर्योधन को मरण एवं अपयश दिलाया |
ग्यारहवे गुरु ने राजा नल को राजभ्रष्ट, वनवास एवं पत्नी वियोग दिलाया |
बारहवे गुरु ने पांडू का वनवास एवं मरण कराया |
किन्तु ऐसा नही है कि बृहस्पति कोई चमत्कारी फल कभी देता ही न हो | लग्न में केंद्र का बृहस्पति ही कुलदीपक योग भी बनाकर प्राचार्य, शिक्षक, उपदेशक, पूजनीय, धार्मिक संस्थाओ का उच्च पधाधिकारी बनाने में भले ही अत्यधिक शुभ हो कितु लग्न में बैठा गुरु पाप ग्रह के द्रष्टि सम्बन्ध से चेहेरे को आकर्षकहीन, कालावर्ण, या व्यक्तित्वहीन, रोगी, आलसी अथवा सामाजिक या चारित्रिक दोषों से कलंकित करने का दुर्योग भी बनता है | ऐसा व्यक्ति बाहरी या भीतरी लोक चिन्ताओ से जलता रहता है| ऐसे व्यक्ति में बड़प्पन पाने कि अत्यधिक इच्छा रहती है | चोथे गुरु से तो 16वे वर्ष में घर छोड़कर प्रवास में चला जाता है | उच्च का हो तो पिता को कष्ट, माता को 60 वर्ष तक सुख देता है | वाहन भूमि भवन आदि का पूर्ण सुख मिलता है | किन्तु पैतृक सम्पति को छोड़ देता है | बृहस्पति बहूत अशुभ हो तो 16 से 20 वर्ष तक विद्याध्यन में रूकावटे पैदा करता है | सांतवे भाव (केंद्र) में गुरु हो तो दूसरा कामदेव ही होता है | किन्तु पत्नी से सम्बन्धअच्छे नहीं रहते | कई बार तो विच्छेद या बिछोह कि स्थिति आ जाती है | पर स्त्रियों से स्वभाव सम्बन्ध बन जाते है | मदनगते वाक्पतो पुत्र चिंता पुत्र सुख प्राप्त नहीं होता | (जातक लंकार) पत्नी गौरवपूर्ण कि होती है | सप्तमेश त्रिक (6/8/12) भाव में और 6/8/12 का स्वामी सप्तम में हो तो अविवाहित भी रहना संभव है | सप्तम भाव में वृष, कन्या, कर्क, वृश्चिक व मीन राशियों का गुरु पत्नी के लिए नेष्ठ होता है | पति पत्नी में झगडा हो जाता है | दाम्पत्य जीवन में तनाव रहता है | सम्बन्ध विच्छेद भी हो जाते है | कई बार अवस्थाओ में पति पत्नी अलग अलग भी रहने लग जाते है | व्यवसाय के लिए भी सांतवा गुरु अच्छा फलदायी नही माना गया है |ये सभी उदारण स्थान हानि वाले सिद्धांत कि पुष्ठि करते है |
दशमभाव (केंद्र) में गुरु सन्यासियों को अधिक शुभ रहता है | परोपकार, धार्मिककृत्य में दशवा गुरु बाधा ही उत्पन करता है | दशवे गुरु से निश्चित व्यवसाय का कहना बहुत कठिन होता है | मीन लग्न वाला पुरुष प्राचार्य पुजारी उपदेशक, सन्यासी, अध्यापक तथा बहुधन्धी भी होता है | कुछ शत्रुराशियो में दशम गुरु विपरीत क्रम, भ्रष्ट आचरण कराने में भी नही हिचकता, भले ही अधिक फलित शुभ श्रेष्ठ, विद्वान, धनी, विजय, बहुजनपूज्य, गीता पाठक होना बताते है, किन्तु व्यवहार में सुसंगत प्रतीत नही होता | पाठक वृन्द कृपया विचार करे | इस पर सुधी पाठको कि प्रतिक्रियाये सहर्ष आमंत्रित है |
लेखक - ज्योतिर्विद्ः घनश्यामलाल स्वर्णकार


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