व्यवसाय निर्धारण में ज्योतिष का योगदान
देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्थाये बदलती रहती है | इस संसार में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए रोटी, कपडा और मकान उसकी मूलभूत आवश्कताए है | इन मौलिक आवश्कताओ को व्यक्ति किसी ना किसी रूप में प्राप्त करने का प्रयत्न करता ही है | इनमे से कुछ, इन्हें बहुत जल्दी प्राप्त कर लेते है, कुछ विलम्ब से प्राप्त करते है और कुछ अपने पूरे जीवन भर संघर्षरत रहते हुए भी पूर्णरूप से प्राप्त नही कर पाते | बहुत से ऐसे भी उदाहरण देखने में है कि अपने पूर्व जन्म के कर्मो के आधार पर उन्हें पूर्वजो से ये सब साधन जन्म के समय से ही प्राप्त हो जाते है और आगे चलकर कुछ लोग इनसे वंचित भी हो जाते है और कुछ इनको अधिक विकसित कर लेते है | ये सब क्या है ? जो हमे सोचने पर विवश करते है | यदि थोडा चिंतन करे तो पायेगे की ये सब ग्रहों का ही प्रभाव है जो व्यक्ति को अपने हाथो में खिलाते रहते है | इसलिए व्यक्ति को जन्म समय के ग्रह प्रभावों का अध्ययन आवश्यक है | इस चिंतन पर ज्योतिष विज्ञान हमारी सहायता करता है |
उपरोक्त मूलभूत आवश्यकताओ का सम्बन्ध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निश्चित ही अर्थ से जुड़ा हुआ है बिना अर्थ के इन मूलभूत आवश्कताओ की पूर्ति संभव नही है और अर्थ की व्यवस्था अर्जन के बिना नही हो सकती और अर्जन उद्यम के बिना संभव नही है, चाहे उद्यम किसी भी प्रकार का हो | उद्यम शारीरिक या मानसिक दोनों प्रकार का हो सकता है | यही साधन आजीविका कहलाती है |
इसका तात्पर्य यह हुआ कि आजीविका ही व्यक्ति के समग्र जीवन को प्रभावित करती है | आजीविका का निर्धारण ग्रहों की स्थाति व प्रभाव पर निर्भर है | इसलिए इसके अध्ययन में ज्योतिष विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान है |
व्यक्ति की आजीविका के स्त्रोत क्या - क्या होगे ? उसका क्या व्यवहार हो सकता है ?, उसे कितने व्यवसायिक कार्यो से गुजरना पड़ेगा ? वह किस व्यवसाय में कब सफलता प्राप्त कर सकता है ? उसका उद्हम शारीरिक होगा या मानसिक अथवा दोनों ही होगे ? यह एक जटिल प्रश्न है | ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में व्यवसाय से सम्बंधित जो नियम व सिद्धांत प्रतिपादित है वे सब देश काल और परिस्थितिवश वर्तमान भौतिक परिवेश में बदल चुके है | यद्यपि सिद्धांत कभी बदलते नही है किन्तु सिद्धांतो से प्रभावित होने वाले साधन बदल जाते है | भाव और अर्थ भी समय के अनुसार बदल जाते है | इसलिए वे प्राचीन सिद्धांत वर्तमान परिवेश में क्या अर्थ और भाव रखते है इस पर हमे पुर्नविचार करना पड़ेगा |
ऐसा नही है कि विद्वान ज्योतिषियों, पंडितो तथा व्याख्याकारो का ध्यान इस और नही है | समय - समय पर इस विषय पर चर्चा होती रही है किन्तु शोध नही हुए है | यदि इस विषय पर शोध किया जाता तो निश्चित ही बदले हुए परिवेश में नवीन सिद्धांतो को प्रतिस्थापित किये जा सकते थे | ज्योतिष कि जितनी भी प्राचीन पुस्तके है उनमे आजीविका, व्यवसाय, कार्यव्यवस्थाओ से सम्बंधित सभी योगायोग उन प्राचीन सामाजिक व्यवस्थाओ के अनुसार ही लिखे गये थे, किन्तु अब तो हमारा समस्त सामाजिक ढांचा ही बदल गया है तो फिर हम उन सिद्धांतो को कैसे लागु कर सकते है ? यदि करेगे तो शुद्ध एवं सही परिणाम प्राप्त नहीं होगे | इस लेखमाला के माध्यम से मेरा यह प्रयास होगा की हम युग के अनुसार विज्ञान के बढ़ते हुए प्रभावानुसार अनेक नवीन आजीविकाओ के स्त्रोत विकसित हो गये है उनको ध्यान में रखते हुए गणना करे और फलित में परिवर्तन लावे |
प्रस्तुत लेख मेरी " ज्योतिष एवं व्यवसाय " अप्रकाशित पुस्तक का अंश है जिसे इस " ज्योतिष समीक्षा" पत्रिका के माध्यम से पाठको के समक्ष क्रमश: प्रस्तुत किया जा रहा है |
वर्तमान योग में अजीविकोपार्जन के अनेक क्षेत्र एवं साधन है | व्यक्ति विशेष का जीविकोपार्जन का क्या साधन होगा | इसके लिए व्यक्ति कि जन्मपत्रिका का अध्ययन का सर्व प्रथम व्यक्ति की शरीरिक एवं मानसिक क्षमताओ का पता लगाना चाहिए | जिससे यह निर्धारण हो सके की उसका कार्य शारीरिक श्रम प्रधान होगा अथवा मानसिक श्रम प्रधान | इसके लिए लग्न दूसरा, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम एवं एकादश भाव एवं भावेशो की प्रक्रति, स्थिति एवं क्षमता पर विशेष विचार किया जाना आवश्यक है |
इसके अतिरिक्त शनि, राहु, गुरु एवं बुध कि स्थिति को भी अध्ययन में सम्मिलित करना आवश्यक है |
गुरु एवं बुध का सम्बन्ध बुद्धि एवं विवेक से विशेष है |
इसी प्रकार शनि एवं राहु का सम्बन्ध शारीरिक श्रम से है किन्तु ध्यान रहे ये ग्रह स्थान विशेष के स्वामी होकर स्थान विशेष पर बैठने से दृष्टि व युति सम्बन्ध स्थापित कर अपनी प्रक्रति बदल लेते है अनेक स्थितियों में शनि और राहु शारीरिक श्रम प्रधान ग्रह होकर भी व्यक्ति को मानसिक श्रम के कार्य से जोड़ देते है | जबकि बुध व गुरु ज्ञान एवं बुध्दि कारक होकर भी शारीरिक श्रम के कार्यो कि और प्रवृत कर देते है |
उदारहण के रूप में जिन लोगो कि जन्म कुंडली में शनि कि प्रबलता होती है | और जब उसका सम्बन्ध दशम एवं दशमेश से होता है तथा विद्या और बुद्धि कारक ग्रहों का योग श्रेष्ठ होता है तो न्यायिक क्षेत्र में उच्च पद की प्राप्ति करा देता है | ऐसे जातक एक सफल दण्ड नायक अथवा न्यायाधीश होते हुए देखे गये है | तात्पर्य यह है कि ग्रह स्थान विशेष के स्वामी होकर स्थान विशेष पर बैठकर अन्य-अन्य ग्रहों के प्रभाववश अपनी प्रक्रति बदल लेते है और नैसर्गिक प्रक्रति के विपरीत फल देते है | अतः यह उसके जन्मकालीन ग्रह तथा राशियों की विभिन्न स्थितियों पर निर्भर करता है| कई बार ऐसा भी होता है की शनि कि स्थिति तो अत्यधिक अनुकूलता लिए हुए है किन्तु विद्या और बुद्धि से सम्बंधित ग्रह क्षीण बली होने के कारण व्यक्ति आवश्यक योग्यता एवं पात्रता प्राप्त नही कर पाता | अतः उस क्षेत्र में जाने के अवसर ही समाप्त कर देते है | इसलिए सर्वप्रथम व्यक्ति के जन्म कालीन ग्रहों कि विभिन्न स्थितियों का पूर्ण अध्ययन कर क्षमताओ का पता लगा लेना चाहिए | इसके पश्चात ही व्यवसाय निर्धारक ग्रहों को निश्चित करना होता है |
इसके अतिरिक्त शनि, राहु, गुरु एवं बुध कि स्थिति को भी अध्ययन में सम्मिलित करना आवश्यक है |
गुरु एवं बुध का सम्बन्ध बुद्धि एवं विवेक से विशेष है |
इसी प्रकार शनि एवं राहु का सम्बन्ध शारीरिक श्रम से है किन्तु ध्यान रहे ये ग्रह स्थान विशेष के स्वामी होकर स्थान विशेष पर बैठने से दृष्टि व युति सम्बन्ध स्थापित कर अपनी प्रक्रति बदल लेते है अनेक स्थितियों में शनि और राहु शारीरिक श्रम प्रधान ग्रह होकर भी व्यक्ति को मानसिक श्रम के कार्य से जोड़ देते है | जबकि बुध व गुरु ज्ञान एवं बुध्दि कारक होकर भी शारीरिक श्रम के कार्यो कि और प्रवृत कर देते है |
उदारहण के रूप में जिन लोगो कि जन्म कुंडली में शनि कि प्रबलता होती है | और जब उसका सम्बन्ध दशम एवं दशमेश से होता है तथा विद्या और बुद्धि कारक ग्रहों का योग श्रेष्ठ होता है तो न्यायिक क्षेत्र में उच्च पद की प्राप्ति करा देता है | ऐसे जातक एक सफल दण्ड नायक अथवा न्यायाधीश होते हुए देखे गये है | तात्पर्य यह है कि ग्रह स्थान विशेष के स्वामी होकर स्थान विशेष पर बैठकर अन्य-अन्य ग्रहों के प्रभाववश अपनी प्रक्रति बदल लेते है और नैसर्गिक प्रक्रति के विपरीत फल देते है | अतः यह उसके जन्मकालीन ग्रह तथा राशियों की विभिन्न स्थितियों पर निर्भर करता है| कई बार ऐसा भी होता है की शनि कि स्थिति तो अत्यधिक अनुकूलता लिए हुए है किन्तु विद्या और बुद्धि से सम्बंधित ग्रह क्षीण बली होने के कारण व्यक्ति आवश्यक योग्यता एवं पात्रता प्राप्त नही कर पाता | अतः उस क्षेत्र में जाने के अवसर ही समाप्त कर देते है | इसलिए सर्वप्रथम व्यक्ति के जन्म कालीन ग्रहों कि विभिन्न स्थितियों का पूर्ण अध्ययन कर क्षमताओ का पता लगा लेना चाहिए | इसके पश्चात ही व्यवसाय निर्धारक ग्रहों को निश्चित करना होता है |
जिस प्रक्रार भावो के कारकतत्व (कारक क्षेत्र) निर्धारित है वैसे ही ग्रहों के भी कारकतत्व (क्षेत्र और विषय) निर्धारित है | किन्तु यहाँ हम केवल व्यवसाय के क्षेत्र तक ही सिमित है | इसलिए यहाँ प्रत्येक ग्रह के सामान्य कारक क्षेत्र के विषय में चर्चा न करते हुए केवल व्यवसायिक क्षेत्र तक ही सिमित रहेगे | अतः व्यवसाय निर्धारक व्यवसायिक क्षेत्रो की जानकारी प्राप्त करना भी आवश्यक ही है |
सूर्य
सूर्य ग्रहों में प्रधान है, ग्रहों का राजा कहलाता है | जब सूर्य आजीविका निर्धारक ग्रह हो तो व्यक्ति उच्च श्रेणी का व्यवसाय करता है | ऐसे व्यवसाय का विस्तार भी अधिक होता है तथा धन भी अधिक लगता है | सूर्य स्वयं अधिकार प्राप्त है | राजा है , अन्य ग्रहों पर पूर्ण अधिपत्य भी रखता है | इसलिए व्यक्ति के व्यवसाय का सम्बन्ध किसी न किसी प्रकार राज्य से जुड़ा होना चाहिए | बलवान सूर्य कि स्थिति में राज्य शासन में प्रतिनिधित्व को जतलाता है | साधारण बली होने पर सरकारी या अर्धसरकारी संस्थान में सेवा का अवसर देता है | सूर्य का सम्बन्ध ओषध, ऊन, ऊनीवस्त्र, धान्य, रत्न, मुक्ता, स्वर्ण, ऊर्जा संसाधन, चिकित्सा विज्ञान, बनस्पति शास्त्र वन्य जीव, जंतु विज्ञान, लकड़ी एवं फर्नीचर का कार्य, आदि से विशेष है | अन्य ग्रहों एवं भावो से जैसा जैसा सम्बन्ध बनता है | उन सबके संयोग से बनने वाला व्यवसाय निश्चित करता है |
चंद्रमा
चंद्रमा एक जलीय ग्रह है | चतुर्थ भाव एवं मन का कारक है | अतः चंद्रमा जब व्यवसाय निर्धारक ग्रह हो तो अन्य ग्रह के सम्बन्ध से जैसी स्थितिया हो इनमे से किसी व्यवसायिक क्षेत्र में व्यक्ति को प्रवर्त करता है | जैसे जल एवं जल से उत्पन्न वस्तुए, शंख, मोती, जलीय फल एवं सब्जिया, नाविक, जल सेना में नौकरी, पेय पदार्थ उत्पादक या वितरक, जलवितरण या नहर, सिंचाई विभाग आदि में सेवाकार्य, होटल हलवाई, दूध - दही कि दुकान, शराब, चिकित्सा के क्षेत्र में जैसे मनोरोग, ह्रदय रोग, तंत्र संबंधी रोग विशेषज्ञ, अध्यापन काव्य रचना, गायन, स्त्री विषयक या उनके साथ कार्य करना जैसे फिल्म उद्योग, कृषि विज्ञान, मौसम विज्ञान, औषध विज्ञान, व ललित कलाओ के विभिन्न क्षेत्र आदि |
मंगल
मंगल वैसे अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है | हिंसा, साहस, युद्ध, लड़ाई - झगडे, छल - कपट, द्यूत, चोरी - तस्करी, षड्यंत्र, तर्क - वितर्क आदि का कारक भी मंगल ही है | प्रशासनिक क्षेत्र रक्षा विभाग, विधि विभाग या न्यायिक क्षेत्र, भूमि भवन, कृषि क्रम, खनिज विज्ञान, भूगर्भवेता, युद्ध कौशल, क्रीडा, चिकित्सा क्षेत्र विशेष कर (सर्जरी, हर्ट, रक्त, उदर आदि) शस्त्र निर्माण, दमकल विभाग, वाहन एवं विधुत विभाग चालक या मैकेनिक, आभुषण निर्माण, अश्वारोहण, वास्तुकला विशेषज्ञ, नेता, प्राचीन कलाक्रति विशेषज्ञ, भूमि क्रय विक्रय, या कमीशन का कार्य किराया, सूद, शेयर्स, अधीवक्ता, रसायन, रंग - रोगन, विधुत एवं विधुतीय उपकरण आदि आदि कार्यो का सम्बन्ध मंगल से है |
बुध
बुध ज्ञान एवं बुद्धि का ग्रह है | अन्य - अन्य ग्रहों से सम्बन्ध बनाने पर, काव्य रचना, लेखन, संपादन, अध्यापन, वक्ता भाषण कला, ज्योतिष (गणित एवं फलित) पौरोहित्य, चिकित्सा विज्ञान में (त्वचा, धमनी, छाती, यौन रोग आदि से सम्बंधित) व्यापर, गणित, बैक, सी.ए.सी.एस. बीमा शेयर्स, गुमास्ता, लेखाकार, ताईप, शीघ्रलिपिक, जनसंपर्क सेवा, होटल प्रबंध, अभिनय गायन, संगीत, न्रत्य, तंत्र-मन्त्र, भक्ति पुराण, व्याकरण वेद, साहित्य आदि से सम्बंधित कार्यो का निर्धारक बनता है |
बृहस्पति
व्याकरण, वेद, विदांग, अध्यापन, न्याय, तर्क, मिमासा, प्राचीन भारतीय विषय, भाषा विज्ञान, ज्योतिष, राजस्थान प्रतिष्ठित कार्य, उपदेशक, पूजा पाठ, भाषण, उच्चपदाधिकारी, सामाजिक, धार्मिक एवं शिक्षण संस्थाओ का संचालक, न्यायिक शेत्र, अधिवक्ता अथवा दण्ड अधिकारी करारोपण या निर्धारक, आदि से सम्बंधित कार्यो का निर्धारक बनता है |
शुक्र
शुक्र वैसे स्त्री ग्रह है किन्तु गुरु के जैसे ही इसका सम्बन्ध भी कानून एवं न्याय से बनता है | इसलिए न्यायिक शेत्र की सेवाये चाहे अधिवक्ता या न्यायाधिकारी, विक्रय कर, आयकर, में सेवा या निर्धारक या कमीशन का कार्य इसके अतिरिक्त काव्य रचना, अभिनय, न्रत्य, ललित कलाओ के विभिन्न शेत्र, व्यापार, वस्त्र, चांदी, जवाहरात, चिकित्सा के शेत्र में (स्त्री रोग, रतिजन्य रोग, बाल रोग आदि) लेखन, पुस्तक विक्रेता, पत्र-पत्रिका एवं पत्रकारिता, फैशन एवं फैंसी सामान व सौन्दर्य प्रसाधनिक सामग्री का निर्माण एवं विक्रय, समुद्र यात्रायें, मणि व्यापार, गोताखोर नाविक, जहाज संबंधी कार्य डाक घर में सेवा, छापाखाना डिजाइनर, दूध -दही, माखन, या मिष्ठान आदि से सम्बंधित कार्यो का जतलाता है |
शनि
मैकनिक कार्य, लोहे का कार्य, कल कारखानों में कार्य, नौकरी, हस्तकला, दासकर्म, यंत्र निर्माण, बिजलीघर में कार्य, चमडा, प्लास्टिक का कार्य, रबर का कार्य, फोम, ऊन, जूट आदि का उद्योग, तेल, पेट्रोल,
गैस, कालीन, मोटावस्त्र निर्माण, वाहन चालक, नेतृत्व करना, दलो का बनना व गज बिगाड़ना, कागज लुग्धी उद्योग, भवन निर्माण एवं भवन निर्माण से सम्बंधित सामग्री, फिटिंग कि सामग्री, ट्रांसपोर्ट, डाकिया, सेवक, कुली, शस्त्र निर्माण, शीशा, रांगा, लोहे, एल्मुनियम धातु का व्यापार कबाड़ी का कार्य, भैस बकरी आदि पशुओ का व्यापार, शराब, निर्माण या वितरण, शिकार या शिकारी, विशेषज्ञ पाद रोग, यक्ष्मा, अस्थिरोग, हृदय रोग, वायु दोष संक्रामक रोग, शल्य क्रिया आदि कृषि कार्य, जेल में किसी पद पर, इंजिनियर, रेल विभाग, पत्थर की मूर्ति आदि का कार्य करवाता है |
राहु
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, तंत्र-मन्त्र दलाली, लाटरी, जंतु पालन, गुप्त विद्याये, जंतु पालन, विष विद्या, मांस मदिरा, छल-कपट दूत क्रिया, कबाड़ी आदि से सम्बंधित कार्यो की और प्रवृत करता है |
केतु
गणित, धर्मशास्त्र, धार्मिक यात्राये, उपदेशक, मनोशास्त्री रस - रसायन- विष आदि का कार्य, दलाली, पाषण कला, उपदेशक आदि कार्यो से सबंध बनता है |
ग्रहों कि व्यावसायिक प्रवृति कि सामान्य जानकारी प्राप्त करने के बाद अब यह देखना है की व्यक्ति की व्यवसायिक वृति का निर्णय कैसे करे | महर्षि पाराशर के सिद्धांत के अनुसार, लग्न अथवा चंद्रमा से दशम स्थान का स्वामी ग्रह जिस ग्रह के नवांश में स्थिति हो | उस ग्रह कि प्रक्रति एवं उस पर प्रभाव डालने वाले अन्य ग्रहों के संयोग से ग्रहों कि निर्धारित वृति के अनुसार ही व्यक्ति के धन प्राप्ति एवं जीविका के साधन बनते है महर्षि जैमिनी ने आजीविका के निर्णय में कारकांश लग्न को प्रधानता दी है | महर्षि जैमिनी के अनुसार कारकांश लग्न में स्थित ग्रह के अनुसार व्यक्ति का विषय निर्धारित किया जाना चाहिए |
उक्त दोनों प्रकार, यध्यपि आधार हीन नही है | किन्तु आधुनिक योग में व्यवसाय के अनेक विषय एवं शेत्र विकसित हो गये है | अतः व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक विषय एवं व्यवसायिक प्रकिया से गुजरना पड़ता है | इसलिए हमे व्यक्ति के व्यवसायिक निर्णय हेतु सुदर्शन चक्र पद्धति के अनुसार लग्न, चंद्र लग्न, व सूर्य लग्न तीनो को प्रधानता देते हुए तीनो लग्नो तथा लग्न के स्वामी ग्रहों के बल एवं उन पर प्रभाव डालने वाले ग्रहों के प्रभाव को भी सम्मिलित करना चाहिये | इस प्रकार किये गये निर्णय सच्चाई के अत्यधिक निकट होगे | फलादेश में कोई भिन्नता नही आयेगी | क्योकि तीनो लग्न व लग्न स्वामियों को प्रभावित करने वाले ग्रहों का एक विधि विशेष के द्वारा मूल्याकन किया जायेगा |
लेखक - ज्योतिर्विद्ः घनश्यामलाल स्वर्णकार


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