होली का उत्सव ..
होलिकोत्सव
गुरुवार 1 मार्च 2018
फाल्गुनी पूर्णिमा को होली का त्यौहार मनाया
जाता है |इसे होलिकोत्सव भी कहते हैं| होली हमारा सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध
त्योहार है |यह अत्यंत लोकप्रिय त्यौहार है क्योंकि इसे स्त्री ,पुरुष, बालक, जवान
तथा बूढ़े सभी बड़े उत्साह से मनाते हैं |इसके समान आनंद और प्रसन्नता देने वाला
हमारा कोई दूसरा त्यौहार नहीं है |यह हमारे सामाजिक त्योहारों में सर्वश्रेष्ठ तथा
सर्वप्रसिद्ध है |इस दिन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सभी बड़े उत्साह से इसे
मनाते हुए आनंदित दिखाई देते हैं |इस त्यौहार में न तो कोई वर्ण-भेद है और ना जाति-भेद
है |यह आम जनता का त्यौहार है, यदि हम यह कहे तो कुछ अत्युक्ति न होगी |जो उत्साह
और आनंद इसाई लोग बड़े दिन के त्यौहार में मनाते हैं उससे कहीं कई गुना अधिक उत्सव
हम लोग करते हैं तथा आनंद लूटते हैं |संहयोग से यह त्यौहार एक ऐसे मस्ताने महीने
में पड़ता है जो स्वयं आनंद देने वाला है फिर इसके होने से सोने में सुगंध आ गई है|
कहने का सारांश यह है कि होली हमारा सर्वश्रेष्ठ सर्व-प्रसिद्ध तथा सर्वप्रिय
सामाजिक त्योहार है.|
काल निर्णय - इस दिन होलिका
दहन भी किया जाता है अतः होलिका के दहन में पूर्व विद्धा प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा
लेनी चाहिए| यदि वह 2 दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो दूसरी लेनी चाहिए |यदि प्रदोष में
भद्रा हो तो उसके मुख की घड़ी त्याग कर प्रदोष में होलिका दहन करना चाहिए| भद्रा में होली को प्रज्वलित नहीं करना चाहिए क्योंकि
इससे राष्ट्र में विद्रोह होता है और नगर में भी शांति नहीं रहती |प्रतिपदा,
चतुर्दशी भद्रा और दिन में होली जलाना सर्वथा त्याज्य है परंतु दुर्देव-वश यदि जला
दी जाए तो वहां के राज्य ,नगर और मनुष्य अद्भुत उत्पादों से एक ही वर्ष में नष्ट
हो जाते हैं |यदि पहले दिन प्रदोष के समय भद्रा हो और दूसरे दिन सूर्यास्त के पहले
पूर्णिमा समाप्त होती हो तो भद्रा के समाप्त होने की प्रतीक्षा करके सूर्य उदय
होने के पहले होलिका दहन करना चाहिए |इसीलिए होलिका जलाने के पूर्व किसी विद्वान
पंडित से उसका उचित समय पूछ कर ही होलीका जलानी चाहिए|.
पूजा विधि - होलिका दहन
के समय काष्ठ का संग्रह करके तथा पुआल और उपले आदि को लाकर उस में जलाना चाहिए |इस
दिन व्रती को चाहिए कि वह प्रातः स्नान आदि के अनंतर संकल्प करके काठ के टुकड़ों
से तलवार बनवाकर बच्चों को खेलने को दें |वे नि:शंक होकर खेलकूद करें और हंसे |इसके
बाद होलिका के दहन स्थान को जल से
प्रोक्षण कर शुद्ध करके उसमें उत्तम काष्ठ, सूखे उपले और सूखे कांटे आदि
भली-भांति स्थापित करें| पश्चात् सायं काल
के समय संपूर्ण पुरवासियों के साथ होली के समीप जाकर शुभासन पर पूर्व या उत्तर मुख
होकर बैठे| इसके बाद होलीका जल का संकल्प करके पूर्णिमा तिथि होने पर किसी शूद्र
अथवा किसी निम्न वर्ग अथवा सूतिका के घर
से बालक द्वारा अग्नि मंगवाकर होली को जलावें|
आग के
प्रचंड रूप धारण करने पर नीचे लिखे मंत्र से तीन बार उसकी प्रदक्षिणा करें, अर्घ्य
दें और होली दंड या शास्त्रीय यज्ञ स्तंभ को शीतल जल से अभिषिक्त करके उसे एकांत
में रख दें|
मंत्र यह है : -
असृक्पाभयसंत्रस्तै:, कृता त्वं होलि बालिशै: ।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि, भूते भूतिप्रदा भव ।।
इसके बाद गेहूं चने और जौ की बाली को होली की
ज्वाला में सेंके लिखें तथा यज्ञ सिद्ध नवान्न तथा होली का भस्म लेकर घर लौट आवे|
वहां घर के आंगन में गोबर से चौका लगाकर अन्नादि का स्थापना करें| इस अवसर पर काष्ठ
की तलवारों को स्पर्श करके बालक लोग आनंद मनावें |ऐसा करने से व्यापक सुख और शांति
होती है |
इस पूर्णिमा को वैष्णव लोग होलोत्सव
कहते हैं| ब्रह्मा पुराण में लिखा है कि फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन हिडोले में
झूलते हुए श्री गोविंद पुरुषोत्तम का जो मनुष्य चित्त को एकाग्र कर के दर्शन करता
है वह निश्चय ही बैकुंठ में जाता है| यह होलोत्सव होली जलाने के बाद होता है| यदि
पूर्णिमा की पिछली रात में होली प्रज्वलित हो तो यह उत्सव प्रतिपदा को होता है और
इसी दिन अबीर या गुलाल उड़ाया जाता है|
कथा :-
होलिका कि कथा भविष्य-पुराण में मिलती है |नारद जी ने युधिष्ठिर से होली की जो कथा
कही थी उसका सारांश दिया जाता है :-
नारद जी ने कहा कि हे राजन फाल्गुन
की पूर्णिमा को सब मनुष्यों के लिए अभय दान देना चाहिए जिससे समस्त प्रजा निडर
होकर हंसे और क्रीडा करे | डंडे और लाठी को लेकर बालक नगर के बाहर होली के लिए
लकड़ी और उपलों का संग्रह करे| उसे होलिका
में विधिवत हवन किया जाए वह पापत्मा राक्षसी किलकिलाहट और मंत्रोंच्चारण से नष्ट
हो जाती है |
हे राजन! दूसरे पुराणों में ऐसी भी कथा है कि ढुंढा नामक राक्षसी ने शिव और पार्वती की तपस्या करके यह वरदान पाया था कि जिस किसी बालक
को वह पाती जाए उसे खाती जाए, परंतु वरदान देते समय शिवजी ने यह युक्ति रख दी थी
कि जो बालक वीभत्स आचरण एवं राक्षसी वृत्ति में निर्लज्जता पूर्वक फिरते पाए
जाएंगे, उनको तू न खा सकेगी| अतः उस राक्षसी से बचने के लिए बालक नाना प्रकार के वीभत्स
और निर्लज्ज स्वांग करते हैं तथा अंट-संट गंदी गालियां बकते हैं| कुछ लोगों का यह
कहना है कि होलिका दहन का यह उत्सव होलीका नामक स्त्री की स्मृति में होता है |जो
हिरण्यकश्यपु की बहन थी हिरणाकश्यप का पुत्र प्रहलाद बड़ा ही भगवान का भक्त था |पिता
ने उसे ऐसा करने से मना किया परंतु उसने कुछ नहीं सुना |इस पर हिरण्यकश्यपु ने उसे
पहाड़ से गिरा या ,हाथी के पैरों तले कुचलवाया | परंतु प्रहलाद को तनिक चोट नहीं
आई उसकी बहन का नाम होलीका था |उसे यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकती|
हिरण्यकश्यपु ने इसी होलीका को यह आज्ञा दी कि तुम प्रह्लाद को गोदी में लेकर आग
में बैठ जाओ| जिससे प्रहलाद जलकर नष्ट हो जाए| होलीका ने ऐसा ही किया परंतु भगवान
की दया से राक्षसी होलीका ही जल गई और प्रहलाद हंसते हुए आग से बाहर निकल आए| इस
समाचार को सुनकर प्रजा लोगों ने बड़ा उत्सव मनाया |इसी राक्षसी होलिका की स्मृति में
यह होली का उत्सव मनाया जाता है| भक्त प्रह्लाद अक्षत आग से निकल गए थे, अतः उस की
प्रसन्नता में अपने आनंद का प्रदर्शन किया जाता है| उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों
में होलिका दहन को संवत जलाना भी कहते हैं, क्योंकि आज से 15 दिन के बाद चैत्र
शुक्ल प्रतिपदा से नया वर्ष प्रारंभ होता है और पुराना वर्ष या संवत समाप्त हो जाता है| अतः नए वर्ष के आगमन
तथा पुराने की समाप्ति के कारण ही इसे संवत जलाना कहते हैं तथा उसे जला कर अपने
हृदय के आनंद को होली खेलकर प्रकट करते हैं |
होलीका
दहन समय और मुहूर्त
होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल की प्रदोष व्यापिनी
पूर्णिमा को भद्रा रहित करना शास्त्रोक्त बताया गया है| इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल
चतुर्दशी/पूर्णिमा गुरुवार दिनांक 1 मार्च 2018 ईस्वी को दिन के 8:58 पर पूर्णिमा
प्रारंभ होकर अंतरात्रि अर्थात् अगले दिन सूर्योदय पूर्व प्रातः 6:30 तक रहेगी | अतः
इसी दिन 1 मार्च को प्रदोष काल में पूर्णिमा होने से होली पर्व मनाया जाएगा, किंतु
इस दिन भद्रा प्रातः 8:58 से रात्रि 7:40 तक रहेगी |शास्त्रानुसार होलिका दहन
भद्रा पश्चात् ही किया जाना चाहिए अतः दिनांक 1 मार्च 2018 को भद्रा पश्चात् रात्रि 7:41 पर होलिका दहन करना श्रेष्ठ रहेगा |
लेखक - ज्योतिर्विद्ः घनश्यामलाल स्वर्णकार


Comments
Post a Comment