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विविध समस्याओं का जैन मंत्रो द्वारा समाधान

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|| नवग्रहशांति कारक मंत्र || सूर्य ग्रह के लिए पद्प्रभ, सोमग्रह के लिए चंद्रप्रभ, मंगलग्रह हेतु वासुपूज्य, बुधग्रह के लिए मल्लिनाथ, गुरूग्रह हेतु वर्धमान, शुक्रग्रह हेतु पुष्पदंतनाथ, शनिग्रह हेतु मुनिसुव्रतनाथ, राहुग्रह हेतु नेमिनाथ एवं केतुग्रह के लिए पाश्र्वनाथ भगवान हैं। ये इन नवग्रहों के स्वामी माने हैं। ऊँ ह्रीं अर्हं सूर्यग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर्हं सोमग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर्हं मंगलग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर्हं बुधग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर्हं गुरूग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर्हं शुक्रग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर्हं शनिग्रहारिष्टनिवारक-श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय नमः सर्वशांतिं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ ह्रीं अर...

व्यापार में सफलता और प्रचुर धन लाभ के लिए वास्तु टिप्स

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आज के भौतिक युग में जीवन में सफलता की पहचान इंसान की समृद्धि एवं संपन्नता से की जाती है | कोई व्यक्ति कितना समृद्ध और संपन्न है यह उसकी सफलता का मापदंड माना जा रहा है | व्यक्ति जब कर्ज लेकर या अपनी जमापूँजी द्वारा कोई व्यवसाय करता है तो इस उम्मीद में करता है की उसे मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो और उसे इस युग के सम्पूर्ण सुख समृद्धि मिले | लाखों की लागत की दुकान जब ब्याज जितना भी नहीं दे पाती तो वे परेशान होने लगते हैं। वर्तनाम युग में सभी व्यक्ति वास्तु को महत्व देने लगे हैं लेकिन उसका कैसे पालन किया जाना चाहिए इसका उन्हें ध्यान कम रह पाता है। दुकानों में यदि वास्तु के नियमों का पालन किया जाए तो उससे आपको लाभ निश्चित ही प्राप्त होंगे। आइए जानें कुछ खास बातें… दुकान या मकान के मुख्य द्वार पर श्वेतार्क गणपति की प्रतिमा लगानी चाहिए | दुकान के अंदर ग्राहक वशीकरण के लिए प्राण प्रतिष्ठित मंत्र चैतन्य, दुर्गा बीसा यंत्र अवश्य लगाएं | दुकान में मालिक इस प्रकार बैठे कि उसका मुंह सदैव पूर्व तथा उत्तर की तरफ ही हो | इस दिशा में मुख करके बैठना धन आगमन के लिए उचित माना गया है | दुक...

मानसिक संतुलन बैठाते ग्रह और रत्न

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जिस प्रकार चिकित्सा विज्ञान के चिकित्सक द्वारा किसी व्यक्ति की मनोचिकित्सा के लिए सर्वप्रथम उसे विभिन्न प्रकार की जांच कर यह निदान करना पड़ता है कि व्यक्ति की मानसिक अस्वस्थता के क्या कारण हैं ? और उसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में क्या असामान्यता है | चिकित्सक विभिन्न परिस्थितियों में अस्वस्थ व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करता है | इस प्रकार के आधार पर ही उसे चिकित्सा प्रदान करता है | यह निश्चित है कि इस चिकित्सा पद्धति में मनोविज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि मनोविज्ञान की सहायता के बिना मानव व्यवहार का अध्ययन संभव नहीं है और ऐसी दशा में प्रभाव ज्यादा लाभप्रद सिद्ध होता है और मनोवैज्ञानिक प्रभाव के लिए यदि ज्योतिष की सहायता ली जाए तो ज्यादा लाभप्रद सिद्ध हो सकती है क्योंकि अच्छा और विद्वान ज्योतिषी उसकी जन्मकुंडली के ग्रहों का उचित अध्ययन कर सही फलादेश करें तो रोगी को शीघ्र ठीक किया जा सकता है |                        जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है ज्योतिष की भी एक वैज्ञानिक प्रकृति है और गणित के आधार पर ग्रहों की स्थ...

बच्चों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ उपयोगी व अनुभूत उपाय

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सीपियों की माला बच्चे को दांत के रोगों से छुटकारा दिलाती है | सिरस के बीजों की माला पहनाने से दांत निकलते समय कष्ट नहीं होता | तांबे या लोहे का कड़ा बच्चों को पहनाने से स्वस्थ रहते हैं | बच्चों के पेट में दर्द या अमाशय में विकार हो तो काले कुत्ते के बाल तांबे के ताबीज में पहना देवें | यदि बच्चे को फिट्स आते हों या मिर्गी रोग हो तो गाय के बायें सींग की अंगूठी बाएँ हाथ की कनिष्ठिका उंगली में धारण कराएं | जायफल के 21 दाने रेशम के धागे में पिरोकर पहनाने से मिर्गी रोग शीघ्र समाप्त हो जाता है | बच्चे के सिरहाने लोहा या चाकू आदि या फिटकरी रखें, नींद में यकायक वह रोएगा या चमकेगा नहीं | नीलकंठ पक्षी के पर रविवार या मंगलवार को बच्चे के सिरहाने रख दें | बच्चा मीठी नींद सोएगा | नजर लगने पर पांच लाल मिर्च, पांच नमक की डली की 9 फेरा कर आग में डाल दें | बच्चे की नजर तुरंत उतर जाएगी | बच्चा यदि दूध पीकर बार बार दूध की उल्टियां करें तो गले में चांदी का चंद्रमा व रुद्राक्ष पहनावें | बच्चे के माथे पर काला टीका, हाथ में काला धागा या नजरिये कालीपोत के बने हुए बांधने से बच्चे को नजर नहीं लगेगी...

जानें कब होगा आपका भाग्योदय

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जन्मकुंडली अर्थात मनुष्य के जीवन का पूर्ण सार जिसे राशी एवं नक्षत्रों के आधार पर बांटा गया है  । कुंडली में ग्रहों की स्थिति अच्छी होना तो आवश्यक है ही, भाग्य से संबंधित ग्रहों का शुभ होना तथा उनकी दशान्तर्दशा  का सही समय पर व्यक्ति के जीवन में आना भी उतना ही आवश्यक होता है अन्यथा कुंडली अच्छी होने पर भी यदि कार्य करने की उम्र शत्रु, नीच या पाप प्रभावी  ग्रहों की दशान्तर्दशा में ही व्यतीत हो रही हो तो, लाख प्रयत्न करने के बाद भी उसका फल नही मिल पता | ऐसा क्यों ? प्रत्येक जातक की  कुंडली में  नवम् भाव   को भाग्य भाव भी  माना जाता है। इस भाव में जिस राशि का आधिपत्य होता है, उसके अनुसार  भाग्योदय   का वर्ष तय किया जाता है।इसके साथ-साथ नवम् भाव में स्थित ग्रह और नवम्  भाव पर अन्य ग्रहों की दृष्टि भी भाग्योदय में सहायक सिद्ध होती हैं | शुभ ग्रह का नवम् में स्थित होना भी प्रायः कम उम्र में भाग्योदय को दर्शाता  है | कुंडली में कुल 12 भाव होते हैं और ये 12 राशियों का प्रतिनिधित्व करते हैं | हर भाव का अपना महत्व होता...

जन्म कुंडली में लग्नेश का महत्व

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जन्म कुंडली में लग्नेश के साथ किसी भाव का स्वामी राशि परिवर्तन करें या दूर  दृष्टि संबंध करें तो उस भाव के जातक को अच्छा फल मिलता है | – यदि धनेश के साथ लग्नेश का संबंध हो तो जातक को अच्छी संपत्ति की प्राप्ति होती है तथा पारिवारिक सुख अच्छा मिलता है – यदि तीसरे भाव  के साथ लग्नेश का संबंध होता है तो  जातक प्रत्येक कार्य में पराक्रमी होता है तथा उसे भाई बहन का सुख मिलता है – चतुर्थेश और लग्नेश का संबंध जातक को भवन वाहन सुख अच्छा देता है|  मात्र सुख व मित्र सुख अच्छा मिलता है -पंचमेश का लग्नेश से संबंध जातक को पुत्र पुत्र आदि का सुख देता है शिक्षा में अच्छी सफलता मिलती है उसके कई अनुयाई होते हैं वह संस्थाओं का नेतृत्व करता है – षष्ठेश वह लग्नेश का संबंध होने पर जातक को शत्रु पक्ष पर विजय प्राप्त होती है | शत्रु मैत्री का हाथ बढ़ाता है मुकदमा बाजी में उसे सफलता मिलती है | ननिहाल पक्ष से लाभ होता है – सप्तम और  लग्नेश का संबंध जातक को सुंदर और सुशील पत्नी या पति का योग बनाता है|  विवाहित जीवन आनंद होता है –  अष्टम भाव और  लग्न...

आकस्मिक धन लाभ योग – हेनरी फोर्ड की जन्म-कुंडली का विश्लेषण

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ज्योतिष शास्त्र में धन से सम्बंधित जन्म -कुंडली में चार भाव होते हैं द्वितीय -भाव, पंचम-भाव, नवम -भाव, तथा एकादश -भाव| जन्म -कुंडली में नवम-भाव को भाग्य-स्थान भी कहते हैं | अतः भाग्य-स्थान प्रबल होने पर ही जातक को धन प्राप्ति होती हैं , अन्यथा नहीं | जन्म-कुंडली में एकादश भाव से लाभ देखा जाता है | द्वितीय -भाव से धन-सम्पति का विचार किया जाता है |पंचम-भाव, संचित -भाव कहलाता है |अत: इन भाव की स्थिति कुंडली में अच्छी होने पर धन का लाभ होता है | साथ ही इन चारों भावों के कारक बृहस्पति की स्थिति भी अच्छी हो तो उसे विपुल धन प्राप्त होता है | जन्म कुंडली में निम्न लिखित योग होने पर भी जातक को लॅाटरी व अन्य स्त्रोतों से धन लाभ होता है | लाभ -भवन का अधिपति ग्रह भाग्य-भवन में हो और भाग्य-भवन का अधिपति ग्रह लाभ-भवन में हो |लाभ-भवन का स्वामी ग्रह धन-भाव में हो और धनेश लाभ-भवन में हो | भाग्येश धन-भाव में हो और धनेश भाग्य-भवन में हो |इन भावों के स्वामी ग्रहों की युति केंद्र-त्रिकोण अथवा शुभ भावों में हो तो भी धन लाभ अच्छा होता है | प्रस्तुत जन्म-कुंडली में पंचम-भाव, द्वितीय -भाव, एकादश...